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सरकार से लड़ाई जारी कार से लड़ाई जा...

दनिया की अगर बात दनिया की दनिया की करें तो तकरीबि

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रा हुल गाँधी की कांग्रेस और उसके साथी तमिलनाडु के स्टालिन, महाराष्ट्र के उद्धव राज ठाकरे और शरद पंवार शिक्षा में हिंदी और भारतीय भाषाओं के महत्व का विरोध करके चुनावी लाभ पाने के लिए आक्रामक अभियान चला रहे हैं। नई शिक्षा नीति के तहत कई राज्य बच्चों को आठ वर्ष की आयु तक हिंदी और उनकी मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था

लागू कर दी है। मजेदार बात यह है की संस्कृत से तमिल, मराठी, हिंदी सहित बोली जाती है। दिलचस्प बात यह है कि हिंदी दुनिया भर के 200 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई भी जाती है। दिलचस्प बात यह है कि हिंदी दुनिया भर के 200 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई भी जाती है।

दनिया की अगर बात दनिया की दनिया की करें तो तकरीबि

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रा हुल गाँधी की कांग्रेस और उसके साथी तमिलनाडु के स्टालिन, महाराष्ट्र के उद्धव राज ठाकरे और शरद पंवार शिक्षा में हिंदी और भारतीय भाषाओं के महत्व का विरोध करके चुनावी लाभ पाने के लिए आक्रामक अभियान चला रहे हैं। नई शिक्षा नीति के तहत कई राज्य बच्चों को आठ वर्ष की आयु तक हिंदी और उनकी मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था

लागू कर दी है। मजेदार बात यह है की संस्कृत से तमिल, मराठी, हिंदी सहित बोली जाती है। दिलचस्प बात यह है कि हिंदी दुनिया भर के 200 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई भी जाती है। दिलचस्प बात यह है कि हिंदी दुनिया भर के 200 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई भी जाती है।

दनिया की अगर बात दनिया की दनिया की करें तो तकरीबि

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रा हुल गाँधी की कांग्रेस और उसके साथी तमिलनाडु के स्टालिन, महाराष्ट्र के उद्धव राज ठाकरे और शरद पंवार शिक्षा में हिंदी और भारतीय भाषाओं के महत्व का विरोध करके चुनावी लाभ पाने के लिए आक्रामक अभियान चला रहे हैं। नई शिक्षा नीति के तहत कई राज्य बच्चों को आठ वर्ष की आयु तक हिंदी और उनकी मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था उनकी

लागू कर दी है। मजेदार बात यह है की संस्कृत से तमिल, मराठी, हिंदी सहित बोली जाती है। दिलचस्प बात यह है कि हिंदी दुनिया भर के 200 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई भी जाती है। दिलचस्प बात यह है कि हिंदी दुनिया भर के 200 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में

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सरकार से लड़ाई जारी रखेंगे सरकार से

रा हुल गाँधी की कांग्रेस और उसके साथी तमिलनाडु के स्टालिन, महाराष्ट्र के उद्धव राहुल राज ठाकरे और शरद पंवार शिक्षा में हिंदी और भारतीय भाषाओं के महत्व का विरोध करके चुनावी लाभ पाने के लिए आक्रामक अभियान चला रहे हैं। नई शिक्षा नीति के तहत कई राज्य बच्चों को आठ वर्ष की आयु तक हिंदी और उनकी मातृभाषा में शिक्षा की व्यवस्था लागू कर दी है। मजेदार बात यह है की संस्कृत से तमिल, मराठी, हिंदी सहित भारतीय भाषाओं का अटूट रिश्ता रहा है। स्वतंत्रता सेनानी, संविधान निर्माता इन भाषाओं के प्रबल समर्थक रहे हैं। हिंदी दुनिया के 150 से ज्यादा देशों में बोली जाती है। दिलचस्प बात यह है कि हिंदी दुनिया भर के 200 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई भी जाती है। पूरी दुनिया की अगर बात करें तो तकरीबन एक अरब लोग हिंदी समझते बोलते हैं और भारत में क्षेत्रीय राजनीतिक स्वार्थ के लिए कुछ नेता जनता को भ्रमित कर भड़काने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। इस दृष्टि से गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों राजभाषा विभाग की स्वर्ण जयंती समारोह में कहा कि हिंदी किसी भी भारतीय भाषा की विरोधी नहीं है, बल्कि सभी भारतीय भाषाओं की मित्र है। हमें अपनी मातृभाषा पर गर्व भी करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मातृभाषा में सोचने, बोलने के साथ-साथ अभिव्यक्त करने की भावना को प्रोत्साहित करना चाहिए। शाह ने सभी राज्य सरकारों से आग्रह किया कि वे स्थानीय भाषाओं में चिकित्सा और इंजीनियरिंग जैसी उच्च शिक्षा प्रदान करने की पहल करें। उन्होंने आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार इस दिशा में राज्यों को हरसंभव सहयोग देगी। गृह मंत्री ने आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार इस दिशा में राज्यों को हरसंभव सहयोग देगी। गृह मंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि प्रशासनिक कार्यों के सांस्कृतिक आत्मगौरव को ऊंचाई तक ले जा सकती हैं। उन्होंने मानसिक गुलामी की भावना से मुक्ति पाने पर जोर दिया। शाह ने कहा कि जब तक कोई व्यक्ति अपनी भाषा पर गर्व महसूस नहीं करता और खुद को उसी आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार इस दिशा में राज्यों को हरसंभव सहयोग देगी। गृह मंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि प्रशासनिक कार्यों के सांस्कृतिक आत्मगौरव को ऊंचाई तक ले जा सकती हैं। उन्होंने मानसिक गुलामी की भावना से मुक्ति पाने पर जोर दिया। शाह ने कहा कि जब तक कोई व्यक्ति अपनी भाषा पर गर्व महसूस नहीं करता और खुद को उसी भाषा में अभिव्यक्त नहीं करता, तब तक वह पूरी तरह आजाद नहीं हो सकता। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, यह राष्ट्र की आत्मा होती है। इसलिए भारतीय भाषाओं को जीवित और समृद्ध बनाए रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि सभी भारतीय भाषाओं का विकास हो, इसके लिए जरूरी है कि आने वाले समय में समर्पित प्रयास किए जाएं। कि जब तक कोई व्यक्ति अपनी भाषा पर गर्व महसूस नहीं करता और खुद को उसी भाषा में अभिव्यक्त नहीं करता, तब तक वह पूरी तरह आजाद नहीं हो सकता। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, यह राष्ट्र की आत्मा होती है। इसलिए भारतीय भाषाओं को